रियायती आवास की निर्माण अनुमति फीस पर बड़ी पीठ में सुनवाई चाहती हैं निर्माण कंपनियां
ओफेक शेली और इज़राइल बिल्डर्स एसोसिएशन, बोनेई हाआरेत्ज़, सरकारी रियायती आवास परियोजनाओं की निर्माण अनुमति फीस को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के समक्ष अतिरिक्त सुनवाई की मांग कर रहे हैं। उनके आवेदन का खुलासा 5 नवंबर को हुआ। इसमें सितंबर के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसने नगर निकायों को चुकाई गई फीस का आधा हिस्सा वापस पाने के लिए प्रत्येक परियोजना की अलग मंजूरी को शर्त बनाया था। यह विवाद मेहिर लामिश्ताकेन कार्यक्रम में शामिल डेवलपरों से संबंधित है। आवेदकों का तर्क है कि सरकारी रियायती आवास निविदाओं में भागीदारी से ही यह स्थापित हो जाना चाहिए कि मकान युवा दंपतियों के लिए हैं; आवास मंत्रालय या संबंधित स्थानीय निकाय के अलग प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उनका प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों माइकल रोज़ेन और अलोन लोवेनस्टीन ने फैसले के कानूनी आधार को “खींचतान पर टिकी कमजोर कानूनी व्याख्या” बताया। आवेदकों का कहना है कि प्रमाणन की शर्त कानून के सामाजिक उद्देश्य को कमजोर करती है और निर्माण लागत बढ़ाती है। उनका यह भी कहना है कि डेवलपरों को कानूनी समयसीमा समाप्त होने का जोखिम झेलते हुए मंजूरी हासिल करने की कोशिश करनी पड़ सकती है। उनके विवरण में सैकड़ों परियोजनाओं और दसियों करोड़ शेकेल पर संभावित असर बताया गया है; विवाद के दायरे के ये आंकड़े आवेदकों का आकलन हैं। मूल मामला बेत शेमेश में ओफेक शेली की एक परियोजना से जुड़ा था। अनुमति मिलने में देरी से बचने के लिए कंपनी ने लगभग 178,000 इज़राइली शेकेल चुकाए और आधी रकम वापस मांगी। मई 2024 में यरूशलम जिला अदालत ने उसका यह पक्ष स्वीकार किया कि कार्यक्रम में भागीदारी ही पर्याप्त थी। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2026 में इस दृष्टिकोण को पलट दिया। नए आवेदन में बड़ी पीठ से पुनर्विचार की मांग की गई है; सुनवाई या फैसले की कोई तारीख घोषित नहीं हुई है।

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