चुनावी वित्तपोषण जाँच की मंज़ूरी के नियमों को लेकर लावी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की
लावी संगठन ने बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय में तत्काल सुनवाई की याचिका दायर कर 26वीं क्नेसेट के चुनाव में संदिग्ध चुनावी रिश्वतखोरी और विदेशी वित्तपोषण की जाँच पर लगी पाबंदियों को चुनौती दी। याचिका में अटॉर्नी जनरल, सरकारी अभियोजन प्रमुख, शिन बेत निदेशक और पुलिस आयुक्त को प्रतिवादी बनाया गया है। इसमें संसदीय सहायकों से पूछताछ से पहले अग्रिम मंज़ूरी लेने की शर्त हटाने की माँग की गई है। वकील यित्ज़हाक बाम और अवीशाग श्वार्ट्ज ने लावी की ओर से याचिका दाखिल की। संगठन इस रुख को चुनौती देता है कि किसी सहायक की जाँच को उसे नियुक्त करने वाले सांसद की जाँच का हिस्सा माना जाना चाहिए। लावी ने कहा, “जाँच से किसी को छूट नहीं है।” उसका तर्क है कि संसदीय सहायकों को पूछताछ से कोई वैधानिक छूट नहीं है और सांसद भी आपराधिक जाँच से मुक्त नहीं हैं। अपनी कानूनी दलील में याचिका पूर्व सांसद अज़मी बिशारा के सहायकों से जुड़े एक पुराने मामले का हवाला देती है। लावी का तर्क है कि सहायकों तक संसदीय उन्मुक्ति का विस्तार करने के लिए स्पष्ट कानून आवश्यक होगा। वह यह भी दलील देता है कि अटॉर्नी जनरल के दिशानिर्देशों के अनुसार जाँचकर्ताओं को सांसदों से संबंधित जाँच की सूचना उन्हें देनी होती है, न कि पहले से उनकी अनुमति लेनी होती है। ये याचिकाकर्ता की दलीलें हैं, बृहस्पतिवार को न्यायालय द्वारा दिए गए निष्कर्ष नहीं। लावी ने चेतावनी दी है कि जाँच के कदमों में देरी से बयानों में तालमेल बिठाने या सबूत नष्ट करने का अवसर मिल सकता है। उसने न्यायालय से ऐसा आदेश माँगा है जिसमें प्रतिवादियों को यह स्पष्ट करना हो कि अटॉर्नी जनरल का रुख लागू क्यों रहना चाहिए। साथ ही उसने यह घोषणा करने की माँग की है कि जाँचकर्ता कानून और अपने पेशेवर विवेक के अनुसार सांसदों और सहायकों से पूछताछ कर सकते हैं। संगठन ने तत्काल सुनवाई और कुछ दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने का भी अनुरोध किया है।

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